कफन प्रेमचंद की कहानी | Kafan Kahani PDF in Hindi

आज के इस लेख में आप मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित Kafan Kahani PDF in Hindi को बड़ी ही आसानी से प्राप्त कर पायेंगें। कफन को प्रेमचंद जी ने 1936 में लिखा था।

कफन प्रेमचंद की सबसे बेहतरीन कहानियों में से एक है जो सामाजिक भेदभाव का बड़े ही मार्मिक ढंग से वर्णन करती है। भारत में सदियों से फैली वर्ण व्यवस्था के अभिशाप को इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने हमारे सामने रखने का प्रयास किया है। 

कफन प्रेमचंद की कहानी

कफन कहानी के मुख्य पात्र घीसू है। वह परिवार का मुखिया है। उनके परिवार में कुल 3 सदस्य हैं, उनका पुत्र माधव और बहू बुधिया।

घीसू और माधव दोनों बहुत आलसी और कमचोर है। घीसू एक दिन काम करने जाता है फिर तीन दिन घर में पड़ा रहता है। माधव भी मुश्किल से आधा घंटा काम करता है और घंटा भर चिलम फुकता रहता है। ऐसा नही है की गांव में काम की कमी थी, परंतु उन दोनों को कोई मजदूरी पर नहीं बुलाता था। उनका काम था रात में कहीं से लकड़ी तोड़ लाना, खेतों से गन्ने, आलू या मटर चुरा लाना और वे उसी प्रकार से अपना पेट भरते थे।

इनके पास घर के नाम पर एक टूटी सी झोपड़ी थी और संपत्ति के नाम पर घर में मिट्टी के दो चार बर्तन थे। फटे पुराने कपड़े पहनकर दिन काट रहे थे। जब बिल्कुल फांके रह जाते तो कोई ना कोई बहाना बनाकर मांग कर खाते थे। जिससे एक बार उधार लिया दोबारा कभी दिया नहीं। 

यदि कोई मारता पीटता तो उन्हें कोई गम नहीं था। कर्ज से लदे होने की बाद भी  इन्हें कोई चिंता नहीं थी। अभिशाप से घिरकर भी आराम से रह रहे थे।

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घीसू के जीवन से 60 वर्ष निकल गए थे। उसकी 9 संताने थी परंतु उनमें से केवल माधव ही बचा था। अब माधव भी अपने पिता के कदमों पर चल रहा था। मानो अपने पिता का नाम रोशन कर रहा हो।

एक वर्ष पूर्व ही माधव की शादी हुई थी। उसकी पत्नी अत्यंत भोली एवं मेहनती थी। उसने आकर उनके खानदान को कुछ व्यवस्थित करना शुरू किया।

वह लोगों के घरों के काम करती और मजदूरी करके इन दोनों का पेट भरती थी। अब तो ये  दोनों और भी ज्यादा आराम परस्त हो गए थे। विवाह के 1 वर्ष पश्चात माधव की पत्नी बुधिया प्रसव के दर्द से कराह रही थी और झोपड़ के बाहर बाप बेटे दोनों कहीं से चुरा कर लाए आलूओं को भून रहे थे। सर्दी की ठंडी रात थी। गांव सोया पड़ा था। वह इतनी पीड़ा ग्रसित होकर चीख रही थी कि सुनने वाले का दिल दहल जाता था।

परंतु वे दोनों भुने हुए आलू खाने में लगे हुए थे। दोनों में से कोई बुधिया के पास नहीं जाना चाहता था। उनको एक दूसरे पर भरोसा नहीं था। घीसू ने माधव को बुधिया के पास जाने के लिए कहा। माधव को भय था कि अगर वह बुधिया को देखने झोपड़ी में गया तो घीसू सारे आलू खा जाएगा। वे बुधिया के तड़प तड़प कर मरने से चिंतित नहीं थे, वह सोच रहे थे कि अगर बुधिया मर जाए तो अच्छा ही होगा क्योंकि वह इन सब दुखों से मुक्त हो जाएगी।

आलू खाने के बाद दोनों ने पानी पिया और वही चादर ओढ़ कर सो गए। बुधिया की कराह को उन्होंने अनसुना कर दिया। बेचारी रातभर तड़पती रही और आखिर सुबह होते होते उसके प्राण पखेरू उड़ गए। उसका बच्चा पेट में ही मर गया था जिसकी वजह से उसकी भी जान चली गई। सुबह उठकर देखा तो मरी पड़ी बुधिया के मुख पर मक्खियां भिनभिना रही थी। 

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सारा शरीर लहू से सना हुआ था। दोनों ने बनावटी रोना शुरू किया गांव इकट्ठा हो गया। कोई मृत बुधिया को देखता तो कोई उन्हें सांत्वना देता था। अब उन्हें बुधिया के दाह संस्कार के लिए लकड़ियों और कफन की चिंता थी। 

दोनों रोते रोते जमीदार के पास गए। आंखों में दीनता के आंसू भरकर घीसू ने जमीन पर सिर रखकर कहा “सरकार बड़ी विपत्ति में हूं।” माधव की घरवाली गुजर गई है। रात भर हम उसकी सेवा करते रहे दवा दारू से जो भी हो सका सब कुछ किया। वह हमें दगा दे गई आपका गुलाम हूं। अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। जमींदार उनसे घृणा करता था तथापि उसने ₹2 फेंक दिए, फिर जमीदार को देखा देखी, बनिए महाजनों से पैसे दिए कुल ₹5 जमा हो गए, कहीं से अनाज मिल गया तो किसी ने लकड़ी दी।

आज पहली बार वे ₹5 के मालिक बने थे। वह कफ़न खरीदने बाजार चले गए। बाजार जा कर वे सोचने लगे कोई हल्का सा कफन लेले। लाश उठाते हुए रात हो जाएगी तब कफन पर किसका ध्यान जाएगा। उनके मन में विचार आया कि कैसा बुरा रिवाज है कि जीते जी तन ढकने को ना मिला उसके मरने पर कफन चाहिए। कफन देखते-देखते संयोग से वे शराब की दुकान के पास पहुंच गए।

उन्होंने शराब की एक बोतल खरीद ली सामने की दुकान से पूरिया और चटनी भी खरीदी। दोनों अपनी भूख को शांत करने लगे बीच-बीच में उन्हें कफन की भी चिंता हुई। उन्होंने सोचा कि पड़ोसी कफन का तो प्रबंध कर ही देंगे। आज बहुत दिनों बाद भरपेट खाने के बाद माधव ने बची हुई पूरियों की पत्तल भिखारी को दे दी। जो खड़ा उनकी ओर भूखी आंखों से देख रहा था।

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किसी को देने के गौरव आनंद और उत्साह का अनुभव उन्हें जिंदगी में पहली बार हुआ था। घीसू ने कहा ले जा खूब खा और आशीर्वाद दें। अंत में दोनों भोजन और नशे से मस्त होकर नाचने और गाने लगे। सभी उनको देख रहे थे। आखिर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े। अब न उन्हें घर पर पड़ी बुधिया की लाश का होश था न खुद का। 

दोस्तों इस कहानी से हमने सीख मिलती है की हमें सदैव एक ऐसे समाज की स्थापना के लिये काम करना होगा जो गरीबी के अभिशाप के साथ ही जातीय भेद और वर्ग विभेद के श्राप से भी मुक्त हो।

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