नमक का दरोगा | Nnamak ka Daroga PDF

आज के इस लेख में आप Nnamak ka Daroga PDF in hindi को प्राप्त कर पायेंगें। नमक का दरोगा उपन्यास हम सभी नें पढ़ा है। यह कहानी हमें कर्मों के फल के महत्व के बारे में समझाती है। यह कहानी अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाती है। 

भले ही इंसान खुद  कितना भी बुरा काम क्यों न करले लेकिन उसे भी अच्छाई पसंद आती है। खुद  कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो लेकिन वह पसंद ईमानदार लोगों को ही करता है। 

इस कहानी के द्वारा लेखक ने प्रशासनिक स्तर और न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार और उसकी सामाजिक सविु कृति को बड़ ही साहसिक तरीके से उजागर किया है।

ये कहानी आज़ादी के पहले की है अग्रंजों ने नमक पर अपना एकाधिकार जताने के लिए अलग नमक विभाग बना दिया। नमक विभाग के बाद लोगो ने कर से बचने के लिए नमक का चोरी छुपे व्यापार भी करने लगे जिसके कारण भ्रष्टाचार की फैलने लगा। कोई रिश्वत देकर अपना काम निकलवाता ,कोई चालाकी और होशियारी से। नमक विभाग में काम करने वाले अधिकारी वर्ग की कमाई तो अचानक कई गुना बढ़ गई थी। अधिकतर लोग इस विभाग में काम करने के इच्छुक रहते थे  क्योकि इसमें ऊपर की कमाई काफी होती थी । 

लेखक कहते हैं कि उस दौर में लोग महत्वपूर्ण विषयों के बजाय प्रेम कहानियों व श्रंगाररस के काव्यों को पढ़कर भी उच्च पद प्राप्त कर लेते थे ।

उसी समय वंशीधर जो एक शिक्षित युवक है, नौकरी की तलाश में घर से निकला तो उस समय उसके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थीं। परिवार कर्ज से दबा हुआ था। उसके पिता जी तो उसे ऐसी नौकरी करने का परामर्श देते थे जिसमें बेतन भले ही कम हो किन्तु रिश्वत का जुगाड़ अवश्य हो किन्तु वंशीधर इस विचार से सहमत नहीं था। 

वह धार्मिक प्रवृत्ति वाला युवक था। उसके पिता ने रिश्वत लेने के लिए कई बातें बताई और सावधानी से काम निकालने के मंत्र भी दिए। उपदेश के पश्चात् आशीर्वाद भी दिया। वंशीधर घर से शुभ घड़ी में निकले थे और नमक विभाग में दारोगा के पद पर नियुक्त हो गए। वेतन अच्छा और ऊपर की कमाई का तो ठिकाना ही नहीं। उसके वृद्ध पिता मुंशी जी को जब यह समाचार मिला तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। पड़ोसियों को भी जलन होने लगी।

क्लिक करो 👉  ध्रुवस्वामिनी नाटक का सार/सारांश | Dhruvswamini Natak Summary PDF

वंशीधर ने शीघ्र ही पद सम्भाला और पूरी ईमानदारी से अपना कार्य करने लगे। कुछ ही समय में उसने अपनी कार्यकुशलता और अच्छे व्यवहार से बड़े-बड़े अधिकारियों का विश्वास जीत लिया। नमक के दफ्तर से एक मील की दूरी पर जमुना बहती थी जिस पर नावों का पुल बना हुआ था। 

एक बार जाड़े की रात में दारोगा वंशीधर को पुल पर से गाड़ियों के गुजरने की आवाज सुनाई दी। उन्हें सन्देह हुआ कि कुछ तो गड़बड़ है। वे तुरन्त तैयार हुए और घोड़े पर सवार होकर नदी के पास पहुँच गए। वहाँ उन्हें गाड़ियों की एक लम्बी कतार दिखाई दी। उन्होंने डाँट कर पूछा, किसकी गाड़ियाँ हैं। 

कुछ देर की चुप्पी के बाद उत्तर मिला- पंडित अलोपीदीन की, जो उस इलाके के प्रतिष्ठित जमींदार तथा बड़े व्यापारी भी थे और अंग्रेज अधिकारियों में उनकी पैठ थी, लेकिन यह पूछने पर कि इनमें क्या है सन्नाटा छा गया।

वंशीवर का संदेह बढ़ गया। बोरे को टटोलकर देखा तो भ्रम दूर हो गया। यह नमक ही था। पंडित अलोपीदीन अपने सजे हुए रथ पर सवार कुछ सोते-जागते से चले आते थे। गाड़ीवानों ने घबराकर जगाया और बोले “महाराज दारोगा ने गाड़ियों रोक दी है और घाट पर खड़े आपको बुलाते हैं। पंडित अलोपीदीन को विश्वास था कि लक्ष्मी जी के सामने सब झुक जाते हैं यहाँ तक कि न्याय व नीति भी। पंडित जी लेटे-लेटे बोले “चलो, हम जाते हैं।” 

फिर पान खाकर, लिहाफ जोड़कर दारोगा के पास पहुंचकर बोले- बाबूजी आशीर्वाद कहिए, हमसे ऐसा कौन-सा अपराध हुआ कि गाड़ियाँ रोक दी गई। पंशीपर बोले सरकारी है। पंडित आरोपीदीन ने शीयर को पच्चीस हजार रूपए तक की रिश्वत देने का लालच दिया किन्तु उस पर धन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा यहाँ तक कि बालीस हजार पर भी नहीं । धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला और दारोगा जी ने पंडित अलोपीदीन को हिरासत में ले लिया। पति अदीन कड़ियों को देखकर मूर्छित होकर गिर पड़े। 

क्लिक करो 👉  Napoleon Bonaparte Ka Jivan Charitra PDF

प्रातः होते ही जो लोग पंडित जी की जय जय करते थे, उनकी इस स्थिति पर तरह-तरह की टीका-टिप्पणी करने लगे। जब पंडित अलोपीदीन हथकड़ियाँ पहन अदालत की तरफ चले तो पूरे शहर में हलचल मच गई। लोगों की बहुत बड़ी भीड़ उन्हें दान के लिए जमा हो गई। लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि पंडित जलोपीदीन कानून के पंजे में फंस गए। उसी समय वकीलों की एक फौज उनकी सहायता के लिए प्रस्तुत हो गई। अब घन और धर्म में युद्ध आरम्भ हो गया था। वंशीयर चुपचाप यह उनके पास सत्य के सिवाए कोई दूसरा बल नहीं था। उनकी तरफ के गवाह भी लाभ से डांवाडोल हो रहे थे।

मुकदमा डिप्टी मजिस्ट्रेट ये की अदालत में पेश हुआ और कुछ ही क्षणों में पंडित अलोपीदीन को रिहा कर दिया गया। उनके पक्ष में मजिस्ट्रेट ने भी लिख दिया कि वे भले आदमी हैं, उनके खिलाफ दिए गए प्रमाण निर्मूल है। नमक दारोगा वंशीयर के लिए भी कहा गया कि हम प्रसन्न है कि यह अपने काम के प्रति सजग और सचेत है। उन्हें भविष्य में सचेत रहने को कहा गया। जब पंडित अलोपीदीन मुसकुराते हुए अदालत से बाहर निकले सभी लोग उनकी तारीफ कर रहे थे और उनके स्वजन पन लुटा रहे थे। दूसरी ओर वंशीधर पर व्यंग्य बाण छोड़े जा रहे थे। आज वंशीधर को संसार का खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ। उन्हें लगा कि ये न्याय व विद्वत्ता के पुजारी सम्मान के पात्र नहीं हैं।

वंशीधर ने पन से पैर मोल लेकर अच्छा नहीं किया था। एक सप्ताह के पश्चात् ही उन्हें नौकरी से निकाले जाने का पत्र मिल गया। वह बहुत दुःखी मन से घर गया। बूढ़े पिता जी को पता चला तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। उन्होंने वंशीधर को भला-बुरा सुना दिया। वंशीधर की माता जी की भी चार धाम की यात्रा की कल्पनाएँ मिट्टी में मिल गई थी। पत्नी ने भी कुछ दिन सीधे मुंह बात नहीं की।

क्लिक करो 👉  मैला आँचल उपन्यास | Maila Aanchal PDF

एक सप्ताह के पश्चात् एक दिन शाम के समय पंडित अलोपीदीन पंशीयर के पर आ पहुँचे। मुंशी जी उनके स्वागत-सत्कार के लिए भागे आए। झुककर सलाम किया तथा खुशामदी की बातें करने लगे और अपने बेटे वंशीवर की बुराई की तथा उसे कुल कलंक तक कह डाला। किन्तु पंडित अलोपीदीन ने उन्हें ऐसा कहने से रोक दिया और उसे कुल तिलक, धर्मपरायण मनुष्य बताया। उन्होंने वंशीयर को अपने कारोबार का स्थायी मेनेजर नियुक्त करने के लिए विनम्र भाव से प्रार्थना की। यह सुनकर वंशीधर के मन का मैल भी घुल गया। पंडित जलोपीदीन ने वेतन के अतिरिक्त हर सुविधा देने का वायदा भी किया। पंडित जी ने अपराध बोध से भरी हुई वाणी में निवेदन करते हुए कहा-

‘परमात्मा से यही प्रार्थना है कि आपको सदैव वही नदी के किनारे वाला बेमुरौवत, उदंड, कठोर किन्तु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे।’

इस कहानी को पढ़कर पता चलता है कि अन्तिम प्रसंग से पहले तक की सभी घटनाओं में प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और समाज द्वारा इस भ्रष्टाचार को स्वीकार करने की भावना को यथार्थ रूप में उजागर किया गया है। यहाँ ईमानदार व्यक्ति के अभिमन्यु के समान निहत्थे और अकेले पड़ जाने की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करना भी कहानी का लक्ष्य है। किन्तु पंडित अलोपीदीन द्वारा वंशीयर की ईमानदारी के फलस्वरूप उसे मैनेजर के पद पर नियुक्त कर देना ईमानदारी का सत्कार करना और मानवीय मूल्य को बढ़ावा देना है।

Leave a Comment