श्री सत्यनारायण व्रत कथा | Satyanarayan Katha PDF

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नमस्कार दोस्तों, आज के इस लेख में हम सत्यनारायण व्रत कथा (Satyanarayan Vrat Katha PDF) को जानेगे, जिसे श्री सत्यनारायण जी को प्रसन्न करने लिए किए जाने वाले दिव्य व्रत को सत्यनारायण व्रत कथा के नाम से जाना जाता है।

श्री सत्यनारायण व्रत-पूजन का महत्त्व 

श्री सत्यनारायण व्रत-पूजन के लिए पूर्णिमा या संक्रांति का दिन सबसे उत्तम माना गया है पूजा से पहले  स्नान करके कोरे अथवा धुले हुए शुद्ध वस्त्र पहनें, माथे पर तिलक लगाएँ और शुभ मुहूर्त में पूजन करना शुरू करें। पूजा के लिए शुभ आसन पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके सत्यनारायण भगवान का पूजन करण उत्तम माना जाता है। इसके पश्चात्‌ अगर आपको सत्यनारायण व्रत कथा आती है तो उसका वाचन करें अथवा पंडित द्वारा सुनाई जाने वाली सत्यनारायण व्रत  कथा को श्रद्धा पूर्वक श्रवण करें।

हिंदू धार्मिक कथाओं के अनुसार सत्यनारायण व्रत पूजन करने से जीवन के कष्ट मिट जाते है और सुख सम्रद्धि घर में वास करती है।

दोस्तों यदि आपके जीवन में हमेशा ही कोई न कोई दिक्कत बना रहता है और आपके अनेक प्रयासों के बाद भी उस संकट से बाहर नही निकल पा रहे हैं, तो आपको कम से कम छः माह में एक बार श्री सत्यनारायण कथा का आयोजन अवश्य करवाना चाहिए। इससे आपके संकटों का निवारण हो जायेगा लेकिन यदि आप किन्हीं कारणों से ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं तो आप प्रत्येक गुरुवार को इस व्रत का पालन कर सकते है ऐसा करने से भी आपको बहुत लाभ होता है।

श्री सत्यनारायण पूजा सामग्री

सर्वप्रथम पूजा के लिए केले के पत्ते व फल के अलावा पंचामृत, पंचगव्य, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, लाल कपडा, शुद्ध गाय का घी, दीपक, कलश, गंगाजल, हवन सामग्री, आम की लकड़ी व दूर्वा की आवश्यकता होती है।

श्री सत्यनारायण की पूजा के लिए दूध, मधु,, गंगाजल, तुलसी पत्ता, पांच मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है जो श्री सत्यनारायण भगवान को सबसे प्रिय है।

इन्हें प्रसाद के तौर पर फल, मिष्टान्न के अलावा आटे को भून कर उसमें चीनी मिलाकर एक प्रसाद बनता है जिसे सत्तू ( पंजीरी ) कहा जाता है, उसका भी भोग श्री सत्यनारायण भगवान को लगाया जाता है।

सत्यनारायण व्रत पूजा विधि

सबसे पहले पूजन स्थल को गाय के गोबर से लीप कर पवित्र करें फिर वहां एक अल्पना बनाएं और फिर उस पर पूजा की चौकी रखें।

इस चौकी के चारों पाये के पास केले के पत्ते लगाएं। इस चौकी पर शालिग्राम या ठाकुर जी या श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित करें।

पूजा करते समय सबसे पहले विघन्हर्ता गणपति की पूजा करें फिर इन्द्रादि दशदिक्पाल की और क्रमश: पंच लोकपाल, सीता सहित राम, लक्ष्मण की, राधा कृष्ण की पूजा के पश्चात ठाकुर जी व सत्यनारायण की पूजा करें।

इसके बाद लक्ष्मी माता की और अंत में महादेव और ब्रह्मा जी की पूजा करें।

पूजा के बाद श्री सत्यनारायण जी की आरती करें और चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण करें। तत्पश्चात पुरोहित जी को भोजन कराएं साथ ही दक्षिणा एवं वस्त्र दान करें । पुराहित जी के भोजन के पश्चात उनसे आशीर्वाद लेकर आप स्वयं भोजन करें।

श्री सत्यनारायण कथा प्रथम अध्याय

एक समय शोनकादि अट्ठासी हजार ऋषियों ने श्रीसूत जी से पूछा- “हे प्रभु ! इस कलियुग मे वेद-विद्या रहित मनुष्यो को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिलेगी तथा उनका उद्धार कैसे होगा ? 

हे मुनि श्रेष्ठ ! कोई ऐसा तप कहिए जिसे करने से थोड़े समय मे ही पुण्य प्राप्त हो तथा मनवांछित फल भी मिले, श्रीसूत जी बोले- “हे वैष्णवों में पूज्य ! आप सब ने प्राणियो के हित की बात पूछी है। अब मै उस श्रेष्ठ व्रत को आप लोगो से कहूंगा जिस व्रत को नारद जी ने श्री लक्ष्मीनारायण भगवान् से पूछा था और श्री लक्ष्मीपति ने मुनि श्रेष्ठ नारद जी से कहा था। यह कथा ध्यान से सुनो ! 

एक समय, योगीराज नारद जी दूसरो के हित की इच्छा से, अनेक लोकों मे घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे। वहाँ बहुत से मनुष्यो को अपने कर्मो के कारण अनेक दुःखो से पीड़ित देखकर उनका मन दुखी हो गया, उन्होंने सोचा क्या कुछ ऐसा नही है जिसको करने से इनके दुःखो का अन्त हो सकेगा, ऐसा मन मे सोच कर इन्द्र लोक को गए । 

वहाँ श्वेत वर्ण चार भुजाओ वाले देवो के ईश: नारायण को (जिनके हाथो में शंख, चक्र, गदा और  पदम् थे तथा वरमाला पहने हुए थे) देखकर स्तुति करने लगे। “हे भगवान् !  आपको मेरा नमस्कार है। आप अत्यन्त शक्ति से सम्पन्न है। मन तथा वाणी भी आपको नही पा सकती। आपका ना आदि न ही अन्त है। आप तो निर्गण स्वरूप सृष्टि के भक्तो के दुःखो को नष्ट करने वाले हो।

तब श्री नारायण ने कहा हे मुनि श्रेष्ठ आपके मन में क्या है ? आपका किस काम के लिए यहाँ आये है? निःसंकोच कहो तब नारद मनि बोले- “मृत्युलोक मे सब मनुष्य जो अनेक योनियो मे पैदा हुए है, अपने-अपने कर्मों के द्वारा अनेक दु:खो से दुखी हो रहे है। हे नाथ मुझउन पर दया दिखाइए और बताइये कि कैसे उन मनुष्यो के सब दुःख दूर हो सकते है।

” श्री नारायण भगवान् जी बोले-हे नारद ! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस काम के करने से मनुष्य मोह से हट जाता है मै वह कहता हूं। ध्यान से सुनो- बहुत पुण्य देने वाला स्वर्ग तथा मृत्युलोक दोनो मे दुर्लभ यह उत्तम व्रत अगर कोई विधानपूर्वक सम्पन्न करताहै तो मनुष्य मोह से छूट जाता है  श्री सत्यनारायण भगवान् का यह व्रत को विधानपूर्वक सम्पन्न करके मनुष्य सभी सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है।”

श्री भगवान् के वचन सुनकर नारद मुनि बोले कि उस व्रत का फल क्या है? क्या विधान है ? किसने यह व्रत किया है और किस दिन यह व्रत करना चाहिए ? 

हे भगवान् मुझसे विस्तार से कहो । भगवान् बोले-दुःख शोक को दूर करने तथा विजयी करने वाला है यह व्रत। भक्ति और श्रद्धा के साथ किसी भी दिन मनुष्य श्री सत्यनारायण की शाम के समय ब्राह्मणो और बन्धुओ के साथ धर्म परायण होकर पूजा करें। भक्तिभाव से नैवेद्य, केले का फल, घी, दूध और गेंहू का चूर्ण सवाया लेवे । गेहूं के अभाव में साठी का चूर्ण, शक्कर अथवा गुड़ लें तथा भक्ति-भाव से भगवान् का स्मरण करता हुआ समय व्यतीत करे। इस तरह इसे करने पर मनुष्यो की इच्छा निश्चय पूरी होती है। और मृत्युलोक पर यही मोक्ष का सरल उपाय है।

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॥ प्रथम अध्याय सम्पूर्ण ॥

श्री सत्यनारायण कथा दूसरा आध्याय

सूतजी बोले- हे ऋषियों ! जिसने पहले समय मे इस व्रत को किया है उसका इतिहास कहता हूं ध्यान से सुनो । सुन्दर काशी पुरी नगरी मे एक अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह भूख और प्यास से बेचैन हुआ पृथ्वी पर घुमता था। एक दिन भगवान् ने ब्राह्मण को दुःखी देखकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके पास जा कर आदर के साथ पूछा-हे विप्र! तुम नित्य ही दु:खी होकर पृथ्वी पर क्यो घुमते हो? हे श्रेष्ठ ब्राह्मण यह सब मुझसे कहो, मै सुनना चाहता हूं। ब्राह्मण बोला- मै निर्धन ब्राह्मण हूँ, भिक्षा के लिये पृथ्वी पर फिरता हैं।

 हे भगवान ! यदि आप इससे छुटकारे का उपाय जानते हो तो कृपा कर कहो। वृद्ध ब्राह्मण बोला कि श्री सत्यनारायण भगवान् मनवांछित फल देने वाले है। इसलिए हे ब्राह्मण उनका पूजन मात्र से मनुष्य सब दुःखो से मुक्त होता है। ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बतला कर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले श्री सत्यनारायण भगवान अन्तर्धान हो गए। 

जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण ने बतलाया है, मै उसको करूंगा, यह निश्चय करने पर उस वृद्ध ब्राह्मण को रात मे नींद नही आई। वह सवेरे उठ कर श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिये चल दिया। उस दिन उसको भिक्षा मे बहुत धन मिला जिससे बन्धु-बांधवों के साथ उसने श्री सत्यनारायण का व्रत किया। इसके करने से विप्र सब दुखो से छुटकर अनेक प्रकार की सम्पत्तियो से युक्त हुआ। वह विप्र हर मास व्रत करने लगा। इस तरह सत्यनारायण भगवान् के व्रत को जो करेगा। वह सब पापों से छूट जाता है

ऋषि बोले- हे मुनीश्वर ! संसार मे इस विप्र से सुनकर किस-किस ने इस व्रत को किया हम सब सुनना चाहते है। इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा है । सूतजी बोले- हे मुनियों ! सुनो। एक समय यह वृद्ध ब्राह्मण धन और एश्वर्य के अनुसार बन्धु- बान्धवो के साथ व्रत करने को तैयार हुआ। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया और बाहर लकड़ियो को रखकर विप्र के मकान मे गया। प्यास से दु:खी होकर लकड़हारा उनको व्रत करते देखकर विप्र को नमस्कार कर कहने लगा कि आप यह किसका पूजन कर रहे है और इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है ? कृपा करके मुझसे कहो। 

ब्राह्मण ने कहा- सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह श्री सत्यनारायण भगवान् का व्रत है, इनकी ही कृपा से मेरे यहां धन-धान्य आदि की वृद्धि हुई है, विप्र से इस बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। भगवान् का चरणामृत ले और भोजन करने के बाद अपने घर को गया।

लकड़हारे ने अपने मन मे इस प्रकार का संकल्प किया कि आज ग्राम मे लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से सत्यनारायण देव का उत्तम व्रत करूंगा। यह मन मे विचार कर वह बूढ़ा आदमी लकड़ियां अपने सिर पर रखकर जिस नगर गया वहां धनवान लोग रहते थे।

उस रोज वहां पर उसे उन लकड़ियों का दाम पहले दिनों से चौगना मिला और प्रसन्न होकर पके केले की फली, शक्कर, घी, दुग्ध, दही और गेंहू का चूरन इत्यादि श्री सत्यनारायण भगवान् के व्रत की कुल सामग्रियों को लेकर अपने घर गया। फिर उसने अपने भाइयों को बुलाकर विधि के साथ श्री सत्यनारायण भगवान् का पूजन और व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन, पुत्र और संसार के समस्त सुख भोग कर बैकुण्ठ को चला गया।

॥ दूसरा अध्याय सम्पूर्ण ॥

श्री सत्यनारायण कथा तृतीय आध्याय

श्री सूतजी बोले, हे ऋषि-मुनियो! अब मैं आपको आगे की कथा सुनाता हूं प्राचीन समय में कनकपुर में उल्कामुख नामक एक बुद्धिमान् तथा सत्यवादी राजा राज करता था। वह प्रतिदिन मंदिर में जाकर श्री सत्यनारायण भगवान् की पूजा करता था और निर्धनों को खूब अन, वस्त्र और धन दान करता था। उसकी पत्नी सुभद्रा बहुत सुशील थी। वे दोनों हर महीने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करते थे। श्री सत्यनारायण की अनुकम्पा से उनके महल में धन-सम्पत्ति के भण्डार भरे थे। उनकी सारी प्रजा बहुत आनंद से जीवन-यापन कर रही थी। 

एक बार राजा और रानी बहुत से लोगों के साथ जब भद्रशीला नदी के किनारे श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा कर रहे थे, तो नदी के किनारे एक बड़ी नौका आकर ठहरी। उस नाव में एक धनी व्यापारी यात्रा कर रहा था। वह बहुत-सा धन कमाकर अपने नगर को लौट रहा था। उसका सारा धन उस नाव में रखा हुआ था।

नाव से उतरकर व्यापारी राजा के समीप पहुंचा। राजा को पूजा करते देख उसने कहा, ‘हे राजन्! आप इन सब लोगों के साथ मिलकर किसकी पूजा कर रहे हैं? इस पूजा के करने से मनुष्य को क्या लाभ होता है?’ राजा ने व्यापारी से कहा, ‘हम हर पूर्णिमा को सत्यनारायण भगवान् का व्रत करते हैं और फिर पूजा-अर्चना के बाद भगवान् का प्रसाद लोगों को बांटकर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करते हैं। सत्यनारायण भगवान की पूजा से। निस्सन्तान को सन्तान प्राप्त होती है। दुखियों के दु:ख दूर होते हैं।

राजा की बात सुनकर व्यापारी ने कहा, ‘हे राजन्! मैं भी सत्यनारायण भगवान् का व्रत करना चाहता हूं। कृपया मुझे इस व्रत को करने की विधि बतलाएं।’राजा ने व्यापारी को सत्यनारायण व्रत की पूरी विधि बताई। राजा ने व्रतकथा सुनने के बाद व्यापारी को भी प्रसाद दिया। श्री सत्यनारायण भगवान् का स्मरण करते हुए व्यापारी ने प्रसाद ग्रहण किया और वापस लौटकर अपनी पत्नी लीलावती से कहा, ‘हमारी कोई सन्तान नहीं है। कनकपुर के राजा उल्कामुख ने मुझे बताया है कि श्री सत्यनारायण भगवान् का व्रत करने और उनकी कथा सुनने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। 

यदि सत्यनारायण भगवान् की अनुकम्पा से हमारे कोई सन्तान हुई तो मैं श्री सत्यनारायण भगवान् का व्रत अवश्य करूंगा।’ व्यापारी के ऐसा निश्चय करने के कुछ समय बाद लीलावती गर्भवती हुई। दसवें महीने में उसने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। व्यापारी ने पुत्री जन्म पर बहुत खुशियां मनाई, लेकिन सत्यनारायण भगवान का व्रत नहीं किया। 

जब उसकी पत्नी लीलावती ने अपने पति से श्री सत्यनारायण भगवान् का व्रत करने के लिए कहा तो वह बोला, ‘अभी क्या जल्दी है। मैं इधर व्यापार में बहुत व्यस्त हूं। मुझे अभी फुर्सत नहीं है। जब अपनी बेटी बड़ी हो जाएगी और इसका विवाह करूंगा तो मैं अवश्य श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करूंगा। अपने पति के वचन  सुनकर लीलावती चुप रह गई। व्यापारी की कन्या कलावती शुक्लपक्ष के चंदमा की । तरह तेजी से बड़ी होने लगी। पलक झपकते ही 16 वर्ष बीत गए। 

एक दिन व्यापार में  बहुत-सा धन कमाकर घर लौटे व्यापारी ने अपनी बेटी को सहेलियों के साथ उपवन में। घूमते देखा तो उसे उसके विवाह की चिन्ता होने लगी। व्यापारी ने कलावती के लिए। सुयोग्य वर ढूंढ़ने के लिए अपने सेवकों को दूर-दूर के नगरों में भेजा। व्यापारी के सेवक कंचनपुर नगर में पहुंचे। उस नगर में उन्होंने एक वणिक-पुत्र को देखा। वणिक का बेटा अत्यंत सुन्दर और गुणवान् था। 

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सेवकों ने वापस लौटकर व्यापारी को उस वणिक के बेटे के बारे में बताया। व्यापारी उस सुंदर लड़के को देखकर बहुत प्रसन हुआ और कलावती का विवाह बहुत धूमधाम से उसके साथ कर दिया। दहेज में उसने वणिक-पुत्र को बहुत-सा धन दिया। कलावती का विवाह भी हो गया, लेकिन व्यापारी ने श्री सत्यनारायण का व्रत नहीं किया। लीलावती ने अपने पति से कहा, ‘नाथ! आपने कलावती के विवाह पर श्री सत्यनारायण भगवान् का व्रत करने का निश्चय किया था। अब तो आपको व्रत कर लेना चाहिए।

‘ पत्नी की बात सुनकर व्यापारी ने कहा, अभी तो मैं अपने दामाद के साथ व्यापार के लिए जा रहा हूँ व्यापार से लौटने पर श्री सत्यनारायण भगवान् का व्रत-पूजा अवश्य करूंगा।’ यह कहकर व्यापारी ने कई नावों में सामान भरा और अपने दामाद तथा सेवकों के साथ व्यापार के लिए निकल पड़ा। उस व्यापारी द्वारा बार-बार व्रत का निश्चय करने और फिर व्रत न करने से सत्यनारायण भगवान् क्रोधित हो गए। और व्यापारी को दण्ड देने का निश्चय किया।

व्यापारी अपने दामाद के साथ रत्नसारपुर में पहुंचकर व्यापार करने लगा। एक दिन कुछ चोर महल में चोरी करके भाग रहे थे। सैनिक उनका पीछा कर रहे थे। भागते हुए चोरों ने सैनिकों से बचने के लिए चोरी का धन अवसर पाकर व्यापारी की नावों में छिपा दिया। खाली हाथ चोर आराम से भाग गए।

चोरों का पीछा करते हुए सैनिक व्यापारी के पास पहुंचे। उन्होंने व्यापारी की नावों की तलाशी ली तो उन्हें राजा का चोरी किया गया धन मिल गया। तब सैनिक व्यापारी और उसके दामाद को बंदी बनाकर राजा के पास ले गए। राजा ने उन दोनों को बंदीगृह में डाल दिया और उनका सारा धन ले लिया। श्री सत्यनारायण के प्रकोप से उधर लीलावती पर भी मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उसके घर में चोरी हो गई और चोर सारा धन चुराकर ले गए। घर में खाने के लिए भी अनं का एक दाना नहीं बचा।

भूख-प्यास से व्याकुल होकर व्यापारी की बेटी कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उस ब्राह्मण के घर में श्री सत्यनारायण भगवान् की व्रतकथा हो रही थी। उसने भी वहां बैठकर व्रतकथा सुनी और प्रसाद लिया। घर लौटकर कलावती ने अपनी मां लीलावती को सारी बात बताई। कलावती से ? श्री सत्यनारायण भगवान् की व्रतकथा की बात सुनकर लीलावती ने भी व्रत करने का निश्चय किया।

अगले दिन लीलावती ने अपने परिवार और आसपास के लोगों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा की। पूजा के बाद सबको प्रसाद बांटकर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण किया। लीलावती ने अपने पति और दामाद के घर लौट आने की मनोकामना से श्री सत्यनारायण भगवान् का व्रत किया था। लीलावती के विधिपूर्वक व्रत करने और प्रसाद ग्रहण करने से श्री सत्यनारायण भगवान् ने प्रसन्न होकर उसकी मनोकामना पूरी की। उन्होंने राजा चंदकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा, ‘हे राजन्!

व्यापारी और उसका दामाद बिल्कुल निर्दोष हैं। सुबह उठते ही दोनों को मुक्त कर दो। उन दोनों का सारा धन भी वापस लौटा दो। यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हारा सारा वैभव नष्ट कर दूंगा। इतना कहकर श्री सत्यनारायण भगवान् अंतर्धान हो गए। प्रात: होते ही राजा चंदकेतु ने अपने मंत्रियों और राजज्योतिषी को रात के स्वप्न की बात बताई तो सबने व्यापारी और उसके दामाद को छोड़ देने के लिए कहा। राजा चंदकेतु ने तुरन्त उस व्यापारी और उसके दामाद को छोड़ दिया। उनका सारा धन भी वापस कर दिया। इस प्रकार श्री सत्यनारायण भगवान् की अनुकम्पा से व्यापारी और उसका दामाद दोनों खुशी-खुशी अपने नगर की ओर चल दिए।

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥

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श्री सत्यनारायण कथा चतुर्थ आध्याय

श्रीसूत जी बोले – साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई – ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’ तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हंसते हुए कहा – ‘दण्डी संन्यासी! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ मुद्रा लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर बोले – ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ – ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये।

दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा – ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने श्राप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं।

अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’ दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहां दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा – आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, वो असत्य था मैंने अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें – ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से व्याकुल हो गया।

दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा – ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा।

साधु ने कहा – ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में जो धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये।

भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ – ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा – ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत को अपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा।

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उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह अति आनंदित हुई और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’ माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया।

इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रोती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया ने सोचा – यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये। और लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी।

कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्या सहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूंगा।

सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक आकाशवाणी की – ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं।

कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’ कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र संतुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।

॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥

श्री सत्यनारायण कथा पंचम आध्याय

श्री सूतजी बोले, ‘हे ऋषि-मुनियो! मैं और भी कथा सुनाता हूं। कौशलपुर में एक राजा था-तुंगध्वज उसकी प्रजा उसकी छत्रछाया में आनंदपर्वक रह रही थी। राजा तुंगध्वज अपनी प्रजा के सुख-दुःख का बहुत ध्यान रखता था। लेकिन एक बार उसने भी सत्यनारायण भगवान् का प्रसाद ग्रहण नहीं किया। तब सभी को चिन्ताओं से मुक्त करके, धन-सम्पत्ति से भण्डार भरकर प्राणियों को जीवन के सभी सुख देनेवाले श्री सत्यनारायण भगवान् ने राजा को प्रसाद ग्रहण न करने का दण्ड दिया।

एक दिन राजा तुंगध्वज जंगल में हिंसक पशुओं का शिकार करने निकला था। तेजी से घोड़ा दौड़ाकर शिकार का पीछा करते हुए वह अपने सैनिकों से अलग हो गया। और देर तक हिंसक जानवरों का शिकार किया। अत: कुछ देर विश्राम करने की इच्छा से वह एक बड़े वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गया। समीप ही कुछ चरवाहे श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा कर रहे थे। राजा ने उनके पास से गुजरते हुए सत्यनारायण भगवान्को  नमस्कार नहीं किया। 

चरवाहों ने राजा को पूजा के बाद प्रसाद दिया। तो राजा ने उन्हें छोटे लोग समझकर प्रसाद ग्रहण नहीं किया और घोडे पर सवार हो अपने नगर की ओर चल दिया। राजा जब नगर में पहुंचा तो देखा कि उसका सारा वैभव तथा धन-सम्पत्ति आदि नष्ट हो गया है। श्री सत्यनारायण के प्रकोप से राजा निर्धन हो गया। तब राजज्योतिषी ने राजा से कहा, महाराज! आपसे अवश्य ही कोई भूल हुई है। 

अगर आप उस भूल का प्रायश्चित्त कर लें तो सबकुछ पहले जैसा हो जाएगा।” राजा को तुरन्त अपनी भूल का स्मरण हो आया। अतः मंदिर में  जाकर राजा ने श्री सत्यनारायण भगवान से क्षमा मांगी और  उनकी पूजा की। पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करने से श्री सत्यनारायण भगवान् की अनुकम्पा से चमत्कार हुआ। राजा का खोया वैभव पुनः लौट आया।

श्री सत्यनारायण भगवान की अनुकम्पा से जीवन के सभी सुखों का भोग करते हुए अंत में राजा तुंगध्वज वैकुण्ठ धाम को गया और मोक्ष को प्राप्त किया। श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत-पूजा को जो भी मनुष्य करता है, उसके सभी दुःख, चिन्ताएं नष्ट होती हैं। उसके घर में धन-धान्य के भण्डार भरे रहते हैं। निस्संतानों को सन्तान की प्राप्ति होती है और सभी मनोकामनाओं को प्राप्त कर मनुष्य अंत में मोक्ष को प्राप्त कर सीधे वैकुण्ठ धाम को जाता है।

श्री सूतजी ने कुछ पल रुककर कहा, ‘हे श्रेष्ठ मुनियो! श्री सत्यनारायण भगवान् के व्रत को पूर्व जन्म में जिन लोगों ने किया उन्हें दूसरे जन्म में भी सभी तरह के सुख प्राप्त हुए। वृद्ध शतानंद ब्राह्मण ने पूर्वजन्म में सत्यनारायण का विधिवत् व्रत किया, तो दूसरे जन्म में सुदामा के रूप में भगवान् की पूजा करते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त कर वैकुण्ठ धाम को चला गया। उल्कामुख राजा अगले जन्म में राजा दशरथ के रूप में मोक्ष को प्राप्त करके वैकुण्ठ को गए।

व्यापारी ने मोरध्वज के रूप में जन्म लिया और अपने पुत्र को आरे से चीरकर भगवान की अनुकम्पा से बैकुण्ठ को प्राप्त किया। राजा तुंगध्वज अगले जन्म में मनु के रूप में जन्म लेकर भगवान् का पूजा-पाठ करते हुए, लोकप्रिय । होकर सद्कर्म करते हुए मोक्ष को प्राप्त कर वैकुण्ठ धाम को चले गए। हे ऋषि-मुनियो! श्री सत्यनारायण भगवान् का व्रत और पूजा मनुष्य को सभी चिन्ताओं से मुक्त करके, धन-सम्पत्ति के भण्डार भरकर अंत में जन्म-जन्मान्तर के चक्रव्यूह से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करता है।

॥ पंचम अध्याय समाप्त ॥

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